संक्षिप्त परिचय: इस जीवन का क्या अर्थ है? और क्या हम जो कर रहे हैं वह सही है? ये दो बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न हैं परंतु क्या हम इनके उत्तर खोज पाते हैं? कुछ ऐसा ही कहना चाह रहे हैं कवि अपनी कविता ‘रेत का घर’ में।
वह मशगूल है..
बनाने में
रेत का घर।
अथक परिश्रम से
रखी है नींव मजबूत,
किन्तु नहीं जानता
ढ़ह जाएगा पल भर में ही।
नहीं कमाए हैं
दुआ के सिक्के,
हमेशा लगाई है ठोकरें..
भिखारी को, कुत्ते को,
जरुरतमंदों को,
बस कमाएं हैं पाप..
जिन्हें सीमेंट में मिला कर
लिपापोती है दीवारें,
जो कुछ समय बाद
गल जाएगी।
ठीक इसी तरह…
मशगूल है यह दुनिया!
जो केवल अपना सोचती है,
बाहर से करती है तारीफ..
भीतर से खून..
नहीं मतलब इसे
उन पीड़ितों से,
जो स्वेद बहा बनाते हैं
एक नयी दुनिया।।
रोहताश वर्मा ” मुसाफ़िर “
पता-खरसंडी (राजस्थान)
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कविता के लेखक रोहताश वर्मा ‘मुसाफ़िर’ जी के बारे में जानने के लिए यहाँ पढ़े ।
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