संक्षिप्त परिचय: कवयित्री उषा रानी की यह कविता प्रकृति पर है। इस कविता में कवयित्री प्रकृति के गुणगान करती हैं तथा उस का सम्मान करने की सीख देती हैं।
प्रकृति🌿🍃 के गुण हजार,
समझों तो हो जाये बेड़ा पार ।
बरसों से बंद पड़े घर के द्वार,
द्वार पर लटका बड़ा सा ताला ।
हवाओं के संग अठखेली करता,
मुफ्त में मिट्टी उपहार में पाता ।
बरामदे में आई पानी की फुहार,
मिट्टी में अंकुरित होकर निकली
नयी पौधे की पहली नाजुक डाल,
गंदा बरामदा महक महक गया ।
अब तो मौसम का रंग खिल गया ।
मिट्टी – पानी का सुंदर मेल हुआ,
प्रकृति🌿🍃 का रुप निखरा ।
जाने कितने रंग – रुप खिल गये ।
इंसान की फितरत देखो एकसा होकर,
कितने विपरीत रंग दिखाता,
अपनों को भी दुश्मन बनाता,
अंहकार का मारा, जाने कितने
नाटक करता,
मिट्टी- पानी से सीखना चाहिए
विपरीत होकर भी कैसे दोस्ती
निभाते,
खंडहरों में भी महक जाते,
अपने जीवन को सार्थक कर जाते ।
हाथ-पांव वाला होकर भी
जानवर से भी गया – बीता
अपने जीवन में नर्क बनाता
प्रकृति🌿🍃 का नाश करता,
सबके जीवन में आग लगाता ।
अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारता,
नादान है, लालची है, दुराचारी है,
अपने कर्मों की सजा भुगतता,
फिर भी नहीं सुधरता,
कहीं सूखाग्रस्त होता,
तो कहीं बाढ़ से बह जाता,
कहीं बिजली फट जाती,
शार्टसर्किट से आग लग जाती
जाने कहाँ से अब आ गया
कोरोना नाम का राक्षस
जिसने बदल दी मानव जीवन की
गति,
मानव को अपनी सोच बदलनी होगी,
अपनी करनी बदलनी होगी ।
स्वरचित कविता
उषा रानी पुंगलिया जोधपुर राजस्थान
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